एक बहुत दूर, बहुत दूर, एक ऐसा जादुई जंगल था जिसका नाम था ‘रंगों का वन’। इस जंगल में सब कुछ अनोखा था। पेड़ इंद्रधनुषी रंगों में चमकते थे, फूल रात में तारों की तरह टिमटिमाते थे, और तितलियाँ इतनी बड़ी थीं कि उनके पंखों से हवा में धीमी सी धुन बजती थी – फुस्फुस, फुस्फुस! इतना ही नहीं, इस जंगल के जानवर भी आपस में बातें करते थे, बिलकुल इंसानों की तरह!
इस अद्भुत जंगल में एक छोटा, भूरे बालों वाला, शरारती गिलहरी रहता था, जिसका नाम था आर्यज़। आर्यज़ बहुत फुर्तीला था। उसकी आँखें भूरी थीं और उसकी पूँछ हमेशा हवा में लहराती रहती थी, जैसे वो नाच रही हो। वह अक्सर अपने छोटे से पत्तों के बने बैग में अखरोट और जामुन भरकर रखता था। आर्यज़ को नई चीजें खोजना, पेड़ों पर चढ़ना और अजीबोगरीब आवाज़ें निकालना बहुत पसंद था।
आर्यज़ का सबसे अच्छा दोस्त एक नटखट और चंचल खरगोश था, जिसका नाम था एज़्ज़ा। एज़्ज़ा के कान लंबे और सफेद थे, और उसकी नाक हमेशा फड़कती रहती थी। वह बहुत मिलनसार थी और उसे हरी घास पर दौड़ना, ऊँची छलांग लगाना और आर्यज़ के साथ नई-नई जगहों की खोज करना बहुत भाता था। एज़्ज़ा के गले में हमेशा एक सुंदर फूलों की माला पड़ी रहती थी, जिसे उसने खुद बनाया था।
एक धूप वाले दिन, जब सूरज चमकीले फूलों पर अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहा था, आर्यज़ और एज़्ज़ा पेड़ से गिरे रसीले जामुनों का आनंद ले रहे थे। "यह जामुन कितने स्वादिष्ट हैं!" एज़्ज़ा ने कहा, उसकी नाक खुशी से फड़क रही थी। "हाँ, लेकिन मुझे लग रहा है कि कोई नई चीज़ हो सकती है!" आर्यज़ ने अपनी छोटी सी सूंड से मिट्टी सूंघते हुए कहा। "कुछ नया?" एज़्ज़ा ने उत्सुकता से पूछा। "हाँ, जंगल के पूरब की ओर से एक मीठी सी खुशबू आ रही है।" आर्यज़ ने हवा में सूंघते हुए कहा। "लगता है वहाँ कुछ बहुत खास है!"
एज़्ज़ा की आँखों में चमक आ गई। "तो फिर, चलो खोज करते हैं!" वे दोनों तुरंत उस दिशा में चल पड़े जहाँ से खुशबू आ रही थी। वे पेड़ों के पास से फुर्ती से उछलते, पत्तों में खड़खड़ाहट पैदा करते हुए आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में उन्हें बहुत सारे अजीबोगरीब फूल और पौधे मिले। एक फूल ऐसा था जिसकी पंखुड़ियाँ खुद बदलती थीं – कभी नीली, कभी पीली, कभी लाल! "वाह! ये तो जादू है!" एज़्ज़ा खुशी से बोली।
जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, खुशबू और तेज़ होती गई, और जंगल का नज़ारा भी बदलता गया। पेड़ अब और भी ज़्यादा चमकदार हो गए थे, उनकी पत्तियाँ सुनहरे और चाँदी के रंग की थीं। तभी, एज़्ज़ा ने कुछ महसूस किया। "मेरी नाक कुछ और सूंघ रही है!" उसने कहा। "यह खुशबू तो बहुत मीठी है, लेकिन इसके साथ कुछ नमकीन भी है... और थोड़ी तीखी भी!" आर्यज़ भी सूंघने लगा। "हाँ, मुझे भी लग रहा है... जैसे कि पनीर और फल एक साथ!" वे दोनों हैरान थे। ऐसी खुशबू उन्होंने पहले कभी नहीं सूंघी थी।
कुछ देर बाद, वे एक छोटी सी नदी के पास पहुँचे। यह नदी सामान्य नहीं थी। इसका पानी नीले और हरे रंग का था, और उसमें से छोटे-छोटे बुलबुले निकल रहे थे, जो हवा में फूटकर सुनहरी धुन बजा रहे थे – ‘पॉप, पॉप, ट्विंकल!’ "यह कैसी नदी है?" आर्यज़ ने फुसफुसाते हुए कहा। "मुझे नहीं पता," एज़्ज़ा बोली, "पर लगता है यह हमें आगे जाने का रास्ता दिखा रही है।" नदी के उस पार एक बहुत बड़ा पेड़ था, जो इंद्रधनुषी रंगों में चमक रहा था। उसके फल हर रंग के थे, और वे चमक भी रहे थे।
लेकिन नदी पार करना आसान नहीं था। नदी चौड़ी थी और उसमें बड़े-बड़े, चिकने पत्थर थे। "हम इसे कैसे पार करेंगे?" एज़्ज़ा ने पूछा। "मुझे लगता है कि हमें कुछ बनाना होगा," आर्यज़ ने कहा। "एक पुल जैसा कुछ!" उन्होंने आसपास देखा। उन्हें कुछ मज़बूत लट्ठा, लम्बी लताएँ और कुछ बड़े पत्ते मिले।
पहले, आर्यज़ ने एक मोटा लट्ठा उठाया और उसे नदी में गिराने की कोशिश की। "धुम्म्म!" लट्ठा पानी में गिर गया और एक तरफ झुक गया। "यह काम नहीं कर रहा है," आर्यज़ ने थोड़ा उदास होकर कहा। "यह बहुत भारी है और अकेला नहीं टिक रहा है।" एज़्ज़ा ने भी कोशिश की, लेकिन लट्ठा इतना भारी था कि वह उसे हिला भी नहीं पाई।
एज़्ज़ा फिर सोचने लगी। "हमें कुछ ऐसा चाहिए जो इस पर सहारा दे सके," उसने कहा। "और इसे एक साथ जोड़ने के लिए कुछ मज़बूत भी चाहिए।" आर्यज़ ने अपनी छोटी सी आँखों से चारों ओर देखा। "मुझे एक विचार आया है!" उसने कहा। "अगर हम दो छोटे लट्ठे इस तरह से रखें, और फिर उनके ऊपर एक बड़ा लट्ठा रखें? और उन्हें लताओं से बाँध दें?" यह एक अच्छा विचार था।
उन्होंने मेहनत करनी शुरू की। आर्यज़ ने दो छोटे लट्ठे ढूंढे जो नदी के किनारों पर ठीक से टिक सकें। फिर, एज़्ज़ा ने सबसे लंबी और मज़बूत लताएँ ढूंढीं। आर्यज़ अपने छोटे दाँतों से लट्ठों को खींचता रहा, और एज़्ज़ा उसे धक्का देती रही। यह बहुत मुश्किल काम था, लेकिन वे हार नहीं माने। अंत में, उन्होंने दो लट्ठे नदी के किनारों पर टिका दिए। अब तीसरा, बड़ा लट्ठा उनके ऊपर रखना था।
"एक... दो... तीन!" आर्यज़ ने ज़ोर लगाया। वे दोनों मिलकर उस बड़े लट्ठे को ऊपर खींचने की कोशिश करने लगे। "हुँह, हुम्फ!" उन्होंने इतनी ताकत लगाई कि उनके छोटे-छोटे शरीर पसीने से भीग गए। आखिरकार, बड़े लट्ठे को उन्होंने दो छोटे लट्ठों के ऊपर रख दिया। अब बारी थी उन्हें बांधने की। एज़्ज़ा ने अपनी तेज़ी से लताओं से लट्ठों को कसकर बांधना शुरू किया। उसने एक के बाद एक गाँठ बाँधी, इतनी मज़बूत कि पुल हिले भी नहीं।
"हमने कर दिखाया!" आर्यज़ खुशी से चिल्लाया। पुल अब मजबूत और सुरक्षित लग रहा था। वे धीरे-धीरे पुल पर चढ़े। "टैप, टैप, टैप!" उनके छोटे-छोटे पंजे पुल पर सुनाई दिए। नदी पार करके वे उस इंद्रधनुषी पेड़ के पास पहुँचे। वहाँ, पेड़ के नीचे, एक बड़ी सी टोकरी रखी थी। टोकरी के अंदर क्या था, पता है? मीठे, चीज़ के सुगंध वाले, रंग-बिरंगे फल! कुछ फल नीले थे, कुछ हरे, कुछ बैंगनी – और सब में चीज़ की स्वादिष्ट महक थी।
"यह तो जादू है!" एज़्ज़ा खुशी से झूम उठी। "पनीर और फल एक साथ!" आर्यज़ भी उछल पड़ा। उन्होंने टोकरी से कुछ फल निकाले और उन्हें चखना शुरू किया। "म्ममम! यह तो सबसे स्वादिष्ट चीज़ है जो मैंने कभी खाई है!" आर्यज़ ने मुँह भरते हुए कहा। एज़्ज़ा ने भी हाँ में सिर हिलाया। वे दोनों बैठकर मीठे और नमकीन फलों का मज़ा लेने लगे।
जब उन्होंने पेट भरकर फल खा लिए, तो आर्यज़ ने कहा, "हमें यह अपने बाकी दोस्तों के साथ भी बाँटना चाहिए!" एज़्ज़ा ने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने टोकरी में से कुछ फल चुने और उन्हें अपने पत्तों के बैग में भरने लगे। लेकिन तभी, उन्होंने एक और आवाज़ सुनी। "फड़फड़फड़!" एक छोटा, घायल पक्षी ज़मीन पर गिरा हुआ था। उसके छोटे पंख मुड़े हुए थे और वह दर्द में चीं-चीं कर रहा था।
"ओह! इसे मदद चाहिए!" एज़्ज़ा ने कहा, उसकी आँखों में दुख था। "हाँ, हम इसे छोड़ नहीं सकते!" आर्यज़ ने कहा। उन्होंने पक्षी को उठाया। उसके पंख में चोट लगी थी। "हमें कुछ ऐसा चाहिए जो इसके पंख को ठीक कर सके," आर्यज़ ने कहा। उन्होंने आसपास देखा। उन्हें कुछ नरम पत्तियां मिलीं और एक जड़ी-बूटी भी, जो जंगल के सबसे पुराने ज्ञान वाले उल्लू ने एक बार बताई थी कि घावों को ठीक कर सकती है।
एज़्ज़ा ने अपनी छोटी उंगलियों से धीरे-धीरे पक्षी के पंख पर जड़ी-बूटी लगाई और उसे नरम पत्तियों से लपेट दिया। "यह ठीक हो जाएगा," उसने प्यार से कहा। "थोड़े आराम की ज़रूरत है।" उन्होंने उस पक्षी को अपने फलों से भरे बैग में से एक आरामदायक जगह पर रख दिया, ताकि वह आराम कर सके।
अब, उन्हें वापस जाना था। लेकिन वापस उसी पुल से जाना थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि उन्होंने कुछ फल उठाए थे। एज़्ज़ा के पास एक और विचार आया। "हम एक-एक करके जाएंगे, और सबसे पहले घायल पक्षी को सुरक्षित जगह पर पहुँचाएंगे।" आर्यज़ सहमत हो गया। वे धीरे-धीरे वापस चले। उन्होंने पक्षी को एक घोंसले में सुरक्षित पहुँचाया, और फिर वे अपने गाँव की ओर बढ़ चले।
जब वे वापस पहुँचे, तो बाकी जानवर उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। "तुम कहाँ थे?" एक छोटा बंदर, चीकू, ने पूछा। "हम एक जादुई जगह पर गए थे!" एज़्ज़ा ने उत्साहित होकर कहा। "वहाँ चीज़ के फल थे!" आर्यज़ ने जोर से कहा। सभी जानवर हैरान थे। उन्होंने अपने फलों को सभी दोस्तों के साथ बाँटा। सबने उन स्वादिष्ट फलों का आनंद लिया।
"तुमने बहुत अच्छा काम किया!" एक बूढ़ी भालू, दादी बलू ने कहा। "तुमने न केवल एक नई जगह खोजी, बल्कि एक ज़रूरतमंद की मदद भी की।" आर्यज़ और एज़्ज़ा को बहुत गर्व महसूस हुआ। उन्होंने सीखा कि मुश्किलों का सामना कैसे किया जाता है, कि कैसे मिलकर काम करने से सब कुछ आसान हो जाता है, और यह भी कि दूसरों की मदद करना कितनी अच्छी बात है। उस दिन से, आर्यज़ और एज़्ज़ा और भी अच्छे दोस्त बन गए। वे जानते थे कि साहस, दोस्ती और दयालुता के साथ वे किसी भी जादुई जंगल की खोज कर सकते हैं और किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं। और हाँ, उन्होंने यह भी सीखा कि पनीर और फल का स्वाद एक साथ कितना अच्छा लगता है! रंगीन वन में उनका साहसिक कार्य एक मीठी याद बन गया, जो हमेशा उनके दिलों में चमकता रहा, जैसे रात में टिमटिमाते फूल।