रेगिस्तान का पुस्तकालय
रेगिस्तान की सुनहरी रेत में दूर-दूर तक एक कारवाँ चल रहा था। खालिद, एक बड़ा नरम ऊँट, अपनी पीठ पर किताबों से भरी एक भारी बोरी लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसकी बोरी में रंगीन तस्वीरें वाली कई सारी किताबें थीं, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे रेगिस्तान की रेत हवा में लहराती हो। आज अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस है, और खालिद को एक नखलिस्तान स्कूल तक यह किताबें पहुँचानी हैं, जहाँ अमिना और ज़ायेद उसका इंतज़ार कर रहे होंगे। खालिद को पता था कि ज़ायेद अपनी किताबों के सपने देखता है।
ओस की बूंद और उम्मीद
खालिद धीरे-धीरे चल रहा था, उसकी पीठ पर किताबों का बोझ उसे थोड़ा और धीमा कर रहा था। सूरज ऊपर आसमान में तेज़ चमक रहा था। खालिद ने कुछ कदम चलने के बाद महसूस किया कि उसके कंधे भारी हो रहे थे। उसे अब एक छोटे से पेड़ की छाँव में आराम की ज़रूरत थी। अचानक, उसे कुछ ठंडा और ताज़ा महसूस हुआ। यह एक छोटी ओस की बूंद थी जो एक कंकड़ पर चमक रही थी! खालिद ने धीरे से उसे अपनी जीभ से चाटा।
हवा का गीत
एक हल्की हवा चलने लगी, और रेगिस्तानी हवा में एक मधुर गीत गुनगुनाया। खालिद ने अपनी पलकें झपकाकर हवा को महसूस किया। यह हवा उसकी पीठ पर मौजूद किताबों को धीरे से छू रही थी, जैसे वे भी उसके साथ यात्रा कर रही हों। खालिद को लगा कि जैसे हवा उसे नखलिस्तान की ओर धकेल रही हो। उसने अपनी चाल थोड़ी तेज की।
टीले पर चढ़ाई
खालिद ने टीले को देखा। वह बहुत ऊँचा और बड़ा था। वह जानता था कि इस पर चढ़ना आसान नहीं होगा। उसने अपना पहला कदम उठाया, फिर दूसरा, फिर तीसरा। उसकी मजबूत टाँगें धीरे-धीरे रेत पर चढ़ने लगीं। उसने अपनी नाक में सांस ली और धीरे-धीरे बाहर निकाली, जिससे उसकी ऊर्जा बनी रहे। खालिद को एक किताब पर एक चित्र याद आया, जिसमें एक साहसी यात्री पहाड़ पर चढ़ रहा था। उसे लगा जैसे वह खुद उस साहसी यात्री की तरह हो।
नखलिस्तान की आवाज़
टीले के ऊपर से, खालिद ने एक हरी रोशनी देखी। यह नखलिस्तान था! वह भी सुन सकता था बच्चों के हंसने की आवाज़। वह जानता था कि वह वहाँ पहुँच गया है। उसने अपनी गति थोड़ी और तेज की, यह जानते हुए कि अमिना और ज़ायेद उसका इंतज़ार कर रहे होंगे। खालिद के मन में एक विचार आया: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का अर्थ है सभी को कहानियाँ सुनाना। खालिद ने अपने मुंह से खुश होकर एक हल्की आवाज़ निकाली।
