उल्टी बहती नदियाँ
घने जंगल में, जहाँ ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे, नदियाँ उल्टी बहने लगी थीं! जल सर्र-सर्र करता हुआ ऊपर की ओर जा रहा था, जैसे कोई शरारती बच्चा पानी का खेल खेल रहा हो। सीता, अपनी लाल रेशमी साड़ी में, एक तांबे के कटोरे में जल भर रही थीं, पर यह बहुत मुश्किल था। राम शांत खड़े थे, उनके माथे पर चंदन का तिलक था, और लक्ष्मण अपनी चमड़े की चप्पलें पहनकर हैरानी से देख रहे थे। सीता सोच में पड़ गईं, "अब क्या होगा?"
सीता का पहला प्रयास
सीता ने सोचा, "शायद अगर मैं पानी को धक्का दूँ!" उन्होंने अपने हाथ से नदी के पानी को धीरे से छुआ। जल बुदबुदाया और थोड़ा-सा वापस नीचे आया, पर फिर शरारती होकर ऊपर की ओर भाग गया। राम ने मुस्कुराते हुए धनुष उठाया, सोचा शायद तीर से इशारा करूँ। लक्ष्मण ने अपनी वूल की चादर लपेटी, और उन्होंने भी उलटी बहती नदी में एक कंकड़ फेंका, लेकिन नदी के जल पर कोई असर नहीं हुआ। सीता को लगा, यह तरीका काम नहीं करेगा।
सीता का मधुर गीत
सीता को याद आया, "ओह! शायद गाने से!" उन्होंने अपनी मीठी आवाज में एक प्यारा-सा गीत गाना शुरू किया। उनकी आवाज हवा में फैल गई, जैसे फूलों की खुशबू। जल ने पहले धीरे-धीरे डोलना शुरू किया, जैसे कोई झूला झूल रहा हो। फिर, धीरे-धीरे, सर्र-सर्र की आवाज थम गई। पानी नीचे की ओर बहने लगा, कल-कल करता हुआ, बिल्कुल सीधा! राम ने खुशी से सिर हिलाया। लक्ष्मण ने ताली बजाई, "वाह!"
सब कुछ फिर से ठीक
सीता के गीत से नदियाँ फिर से सीधी बहने लगीं। जल में मछलियाँ खुशी से फुदकने लगीं। बंदर जो पेड़ों पर कूद रहे थे, वे भी रुककर सीता का गीत सुनने लगे। हवा में भी एक मीठी-सी ठंडक भर गई थी। राम ने सीता को देखा, उनके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी। लक्ष्मण ने कहा, "सीता का गीत जादू जैसा है!" अब सभी जीव-जंतु खुश थे और जंगल फिर से पहले जैसा शांत और सुंदर हो गया था।
नैतिकता और विषय सीता का गीत और उल्टी नदियाँ
संगीत में बड़ी शक्ति होती है जो कई समस्याओं को सुलझा सकती है।
कहानी का विषय है जादू, संगीत की शक्ति, प्रकृति के साथ सद्भाव
